बच्चों की आँखों की जाँच नियमित रूप से जरुरी है, कई बच्चों को यह एहसास ही नहीं होता कि उन्हें दृष्टि संबंधी समस्याएँ हैं, क्योंकि ये समस्याएँ धीरे-धीरे विकसित होती हैं, जबकि बच्चों की प्रथम सीढ़ी होती है, चीजों को देखना, पहचानना और समझना, इसलिए, बच्चों की आँखों की जाँच उनके समग्र स्वास्थ्य का एक अभिन्न अंग है
शुरुआती चरणों में आँखों की समस्याओं की पहचान और उनका इलाज करने से भविष्य में गंभीर दृष्टि दोष से बचा जा सकता है, क्योंकि जल्दी पता लगने से समय पर इलाज सुनिश्चित होता है और बच्चों को उनकी शिक्षा और दैनिक गतिविधियों, दोनों के लिए सर्वोत्तम संभव आधार मिलता है।
बच्चों की आँखों की जाँच का महत्व
मंद दृष्टि (Amblyopia) की रोकथाम: बच्चों में स्थायी दृष्टि हानि का सबसे बड़ा और सबसे आम कारण मंद दृष्टि है, जिसे लेज़ी आई और मेडिकल भाषा मे (Amblyopia) भी कहा जाता है और यह तब होता है जब एक आँख दूसरी आँख की तुलना में मस्तिष्क को कमजोर छवि भेजती है, और मस्तिष्क उस कमजोर आँख को अनदेखा करना शुरू कर देता है और इसका सही समय पर पहचान करना बहुत जरुरी है इसलिए बच्चों की आँखों की जाँच सही समय पे करवाना चाहिए और प्रारंभिक चरण में पता लगाया जा सके और समय रहेते उपचार किया जा सके।
जीवन भर आँखों का स्वास्थ्य: बच्चों की आँखों की जाँच से मोतियाबिंद, ग्लूकोमा, रेटिनोपैथी ऑफ प्रीमैच्योरिटी (ROP), और यहाँ तक कि कुछ दुर्लभ नेत्र कैंसर (जैसे रेटिनोब्लास्टोमा) जैसी गंभीर नेत्र रोग का भी प्रारंभिक चरण में पता लगाया जा सकता है और समय रहेते उपचार किया जा सकता है और देर से पता चलने पर दृष्टि हानि का खतरा बढ़ जाता है।
सीखने और स्कूल में प्रदर्शन: बच्चों की आँखों की जाँच का महत्व यह है की बड़े बड़े संघटन जैसे (WHO) और भी संघटनो का अनुमान है कि स्कूल में बच्चे जो कुछ भी सीखते हैं, उसका 80% तक दृश्य जानकारी पर आधारित होता है, और बच्चों में दृष्टि दोष (जैसे निकट दृष्टि दोष, दूर दृष्टि दोष या दृष्टिवैषम्य) सीधे तौर पर पढ़ने में कठिनाई, ध्यान केंद्रित करने में परेशानी और कमजोर लिखावट का कारण बनते हैं, और माता पिता और परिजनों अक्सर, बच्चे को पढ़ाई में कमजोर मान लेते है जबकि असली समस्या उनकी आँखों में होती है।
बच्चों की आँखों की जाँच कब करवाएँ?
बच्चों के विकास के विभिन्न चरणों में आँखों की जाँच करवाना आवश्यक है, और नेत्र रोग विशेषज्ञ (Ophthalmologist) या ऑप्टोमेट्रिस्ट (Optometrist) द्वारा सुझाई गई आँखों की जाँच का शेड्यूल इस प्रकार है जिस्से आपको अपने बच्चों की आँखों की जाँच करवाना चाहिए:
जन्म से एक वर्ष के बीच (शिशु अवस्था)
- सबसे पहली और सबसे महत्वपूर्ण जाँच जन्म के समय बाल रोग विशेषज्ञ (Pediatrician) द्वारा एक बुनियादी नेत्र जांच अस्पताल में की जाती है।
- 3 से 6 महीने के दौरान पहली व्यापक बच्चों की आँखों की जाँच करवानी चाहिए, यह दृष्टि संरेखण, आँखों की गति, और बड़े अपवर्तक त्रुटियों (Refractive Errors) की जाँच के लिए महत्वपूर्ण है।
- अगर आपके बच्चे का जन्म समय से पहले हुआ है (Pre-term), तो रेटिनोपैथी ऑफ प्रीमैच्योरिटी (ROP) की जाँच के लिए तुरंत एक विशेषज्ञ से जाँच करवाना अनिवार्य है।
स्कूल जाने की अवस्था मे (3 वर्ष)
- आपका बच्चा जब बोलना पढ़ना लिखना पहचानना चीजों पे फोकस करना शुरू कर देता है तो उसकी आँखों की जाँच करवाना चाहिए क्यों की इस उम्र में, बच्चा आमतौर पर स्नेलन चार्ट (Snellen Chart) (या चित्रों वाले चार्ट) का उपयोग करके अपनी दृष्टि की तीव्रता (Visual Acuity) का सटीक आकलन करने के लिए सहयोग कर सकता है और यह दृष्टिदोष की पहचान के लिए एक महत्वपूर्ण समय और पहचान होती है।
पाँच साल का होने पर (5 वर्ष और उसके बाद)
- आपको अपने बच्चे का एडमिशन लेने या स्कूल शुरू करने से पहले आँखों की जाँच करवा लेना चाहिए क्यों की यह अंतिम जाँच यह सुनिश्चित करती है कि बच्चे की दृष्टि कक्षा में सीखने ब्लैकबोर्ड पे देखने के लिए पर्याप्त है या नही।
- अगर आपके बच्चे को कोई दृष्टि समस्या नहीं है तो फिर भी अपने बच्चों की आँखों का चेकअप हर एक से दो साल में करवाना चाहिए।
- अगर आपके बच्चे को चश्मा लगा है, या कोई दृष्टि दोष है तो आपको अपने डॉक्टर की सलाह के अनुसार, अक्सर हर 6 से 12 महीने में जाँच करवानी चाहिए।

बच्चों की आँखों की जाँच कितनी जरूरी है?
बच्चों की आँखों की जाँच केवल नज़र का मामला नहीं होता है, यह दिमाग का भी मामला है बल्कि यह मस्तिष्क के स्वस्थ विकास से जुड़ा एक अनिवार्य कदम है, जो मस्तिष्क और आँखें साथ-साथ विकसित होती हैं और न्यूरोप्लास्टिसिटी का सिद्धांत भी बताता है कि बच्चे का मस्तिष्क 8 से 10 साल की उम्र तक सबसे ज़्यादा लचीला होता है और इस महत्वपूर्ण अवधि में, मस्तिष्क आँखों से मिलने वाली जानकारी के आधार पर देखने की क्षमता सीखता और विकसित करता है।
अगर आँखें साफ चित्र नहीं भेजेंगी तो दिमाग धीरे-धीरे उस आँख को अनदेखा करना शुरू कर देता है और यही lazy eye (amblyopia) का कारण होता है, और इस स्थिति का पता शुरुआती वर्षों में नहीं चलता, तो दृष्टि हानि स्थायी हो सकती है, जिसे बाद में फिर किसी भी उपचार से ठीक नहीं किया जासकता है इसलिए बच्चों की आँखों की जाँच शुरुआती चरणों मे बहोत ही जरुरी और अनिवार्य है।
बच्चों की आँखों की जांच में कौन-कौन से टेस्ट होते हैं?
1. Slit Lamp Examination
आपका डॉक्टर Slit Lamp से आपके बच्चे की Cornea, Lens और Eyelid से जुड़ी समस्याओं की जांच करेगा।
2. Vision Acuity Test
आपका डॉक्टर आपके बच्चे को दूर और पास दोनों दूरी की चीज़ें कितनी स्पष्ट दिखती हैं, यह मापता है।
3. Photoscreening
आपके बच्चे को अगर चश्मे का नंबर (Myopia/Hyperopia/Astigmatism) है तो ऑटोरिफ्रैक्शन जाँच कर के पता करेगा।
4. Eye Alignment Test
आपका डॉक्टर आपके बच्चे की आँख मे तिरछापन जिसे भेंगापन (Strabismus) कहा जाता है उसकी जांच करेगा।
5. Binocular Vision Test
आपका डॉक्टर आपके बच्चे की दोनों आंखें मिलकर कितना अच्छा काम करती हैं ये भी एग्जामिनेशन करेगा।
6. Retinal Examination
आपका डॉक्टर आपके बच्चे की गंभीर रोगों का पता करने के लिए रेटिना डिटैचमेंट और रेटिनोब्लास्टोमा जो शिशुओं में एक गंभीर कैंसर होता है उसकी जाँच और जन्मजात रेटिना समस्याएँ की जाँच करेंगे।
बच्चों की आँखों की जाँच न करवाने के जोखिम?
बच्चों की नियमित आँखों की जाँच न कराना, या आँखों में कोई तकलीफ़ होने पर डॉक्टर के पास न ले जाना, बच्चे के वर्तमान और भविष्य दोनों के लिए गंभीर परिणाम लेकर आ सकता है और यह सिर्फ़ चश्मे लगने की बात नहीं है बल्कि उनके जीवन सैली और समग्र विकास पर प्रहार है।
- एम्ब्लायोपिया जिसे लेज़ी आई और सुस्त आँख भी कहा जाता है और यह सबसे आम और चिंताजनक जोखिम कारक है इसकी वजह से बच्चे की एक आँख दूसरी आँख की तुलना में कम देखती है, और उसकी वजह से दिमाग कमजोर आँख से मिलने वाली धुंधली छवि को अनदेखा करना शुरू कर देता है। और सबसे जरुरी बात यह है की अगर इस स्थिति का बचपन में ही लगभग 8-10 साल की उम्र तक इलाज न किया जाए, तो कमजोर आँख में स्थायी रूप से दृष्टि का नुकसान हो जाता है, जिसे बाद में चश्मे, ऑपरेशन या किसी भी उपचार से ठीक नहीं किया जा सकता।
- स्ट्रैबिस्मस जिसेआम बोलचाल मे भेंगापन या तिरछी आँख भी कहा जाता है इसमें बच्चे की आँखों का एक सीध में न होना जैसे एक आँख अंदर या बाहर ऊपर निचे होना और इसका समय रहते इलाज न हुआ, तो यह भी एम्ब्लायोपिया का कारण बन सकता है और आँखों की देखने या फोकस करने वाली क्षमता को स्थायी नुकसान पहुँचा सकता है।
- मायोपिया जिसे हिंदी मे निकटदृष्टि कहा जाता है और इसकी वजह से नज़दीक की नज़र ठीक होती है लेकिन दूर की नज़र ठीक नहीं होती है अगर आपके बच्चे को निकटदृष्टि है और चश्मे की ज़रूरत है और उसे सही समय पर नहीं दिया जाता, तो उसकी नज़र का नंबर तेज़ी से बढ़ सकता है और नियमित जाँच से नंबर को स्थिर रखने में मदद मिलती है।
बच्चों में आँखों की समस्या के सामान्य लक्षण
- पढ़ते समय सिर तिरछा करना या फोकस ना कर पाना
- बच्चों का बार-बार आंख मलना
- दूर की चीजें न देख पाना
- टीवी मोबाइल या कोई भी चीज बहुत पास से देखना
- आँख मिचमिचाना जैसे बार बार पलक झपकाना
- आँखों से पानी आना
- सिरदर्द की शिकायत और स्कूल से आने के बाद या पढ़ते समय माथे में दर्द
- आँख से कीचड़ आना
- फोटो में आँख का चमकना अगर लाल की जगह सफ़ेद दिखे, तो यह गंभीर संकेत हो सकता है
- आँखों से पानी आना
बच्चों में होने वाली आँखों की आम बीमारियाँ
- Amblyopia: अगर समय पर इसकी पहचान न की जाये तो जीवनभर दृष्टि कम रह सकती है।
- Strabismus (भेंगापन): इसको चिकित्सा या चश्मे से ठीक किया जा सकता है, लेकिन इसके लिए भी समय बहोत मायने रखता है।
- Myopia (निकट दृष्टि): मोबाइल टीवी कम्प्यूटर या स्क्रीन टाइम ज्यादा होने के कारण आजकल बच्चों में बहुत ज्यादा बढ़ रहा है।
- Hyperopia (दूर दृष्टि): बच्चे पढाई में कमजोर लगते हैं लेकिन असली कारण उनकी आँखें मे ही होती हैं।
- Astigmatism: कॉर्निया के अनियमित आकार के कारण धुंधला दिखाई देता है जिसके कारण बच्चे का फोकस ठीक नहीं रहता।
- Allergic Conjunctivitis: सर्दी झुखाम या खींचना, लाल आँखें, आँखों से पानी आना,ये सब खुजली जैसे लक्षण होते हैं।
- Congenital Eye Diseases (जन्मजात रोग): बच्चे जन्मजात रोग के साथ पैदा भी हो सकते है जैसे ग्लूकोमा, कैटरेक्ट, रेटिनोब्लास्टोमा, भेंगापन आदि।
बच्चों की आँखों की जाँच कहाँ करवाएँ?
आखिर बच्चों की आँखों की जाँच के लिए कहाँ जाएँ किस्से करवाना चाहिए यह जानना बेहद जरूरी है क्योंकि अलग-अलग विशेषज्ञ अलग-अलग भूमिकाएँ निभाते हैं, और आपको अपने बच्चों की आँखों की जाँच एक योग्य पेशेवर द्वारा ही करवानी चाहिए।
- बाल रोग विशेषज्ञ (Pediatrician): यह सबसे पहेली जाँच और पड़ाव है, जो जन्म के समय और रूटीन चेक-अप के दौरान बाल रोग विशेषज्ञ एक बुनियादी नेत्र जाँच करते हैं, और वे कोई समस्या होने पर आपको आगे के लिए रेफर भी कर सकते हैं।
- ऑप्टोमेट्रिस्ट (Optometrist): ये विशेषज्ञ आँखों की व्यापक जाँच, चश्मे का नंबर बताने और कॉन्टैक्ट लेंस फिट करने का काम करते हैं और आँखों की एक्सरसाइज डाइट देखभाल और रोगों के बारे मे क्या प्रॉब्लम है और काफी हद तक ये सामान्य रोगों और अपवर्तक दोष (निकट-दूर दृष्टि) के लिए यह उपचार और एक अच्छा विकल्प सुझाव दे सकते हैं।
- नेत्र रोग विशेषज्ञ (Ophthalmologist): आँखों के स्पेशल डॉक्टर होते हैं जो आँखों की पूरी तरह से जाँच, मेडिकल उपचार और सर्जरी कर सकते हैं,अगर आपके बच्चे को कोई गंभीर समस्या जैसे मोतियाबिंद, ग्लूकोमा, भेंगापन रेटिनोब्लास्टोमा है या सर्जरी की जरूरत है, तो आपको सीधे एक बाल नेत्र रोग विशेषज्ञ (Pediatric Ophthalmologist) के पास जाना चाहिए लेकिन याद रखें बच्चों की आँख की समस्या वयस्क समस्या से अलग हो सकती है, इसलिए उनकी जाँच करवाना सर्वोत्तम होता है।
बच्चों की आँखों की समस्याओं का उपचार
जब आपका डॉक्टर ऑप्टोमेट्रिस्ट या आई स्पेशलिस्ट आपके बच्चे की आँखों में कोई समस्या देखता है तो फिर उसकी उम्र लक्षण और समस्या की गंभीरता के अनुसार उचित इलाज बताता है जैसे:
- चश्मा या कॉन्टैक्ट लेंस: अगर आपके बच्चे को दृष्टि दोष जैसी समस्या है जैसे मायोपिया (Myopia) हाइपरोपिया (Hyperopia) और दृष्टिवैषम्य (Astigmatism) जैसी इन दोनों स्थितियों में डॉक्टर बच्चे के लिए सही पावर का चश्मा या उम्र के अनुसार कॉन्टैक्ट लेंस सुझाते हैं और यह बच्चों में दृष्टि सुधार का सबसे सुरक्षित और सरल तरीका है।
- पैचिंग थेरेपी: अगर आपके बच्चे को एम्ब्लायोपिया (Amblyopia) लेज़ी आई ऐसी समस्या दिखती है आपके डॉक्टर को तो आपका डॉक्टर आपके बच्चे के लिए पैचिंग थेरेपी सुझा सकता है जिसमें आँख पर कुछ घंटे के लिए पैच लगाया जाता है, जिससे कमजोर आँख को अधिक काम करना पड़ता है और नियमित पैचिंग से आँख की विज़ुअल पावर में सुधार होता है।
- आई ड्रॉप्स: यदि आपके बच्चे को आँखों मे एलर्जि सूजन जलन लाली या हल्का संक्रमण है, तो आपका डॉक्टर एंटी-एलर्जिक या लुब्रिकेटिंग आई ड्रॉप्स लिख सकता है इससे खुजली, लालपन संक्रमण और पानी आने जैसी समस्याएँ तेजी से कम होती हैं।
- सर्जरी: बहोत कम स्थितियों में सर्जरी की भी जरूरी हो सकती है अगर आपके डॉक्टर को मोतियाबिंद जन्मजात रोग या काला मोतियाबिंद स्ट्रैबिस्मस (भेंगापन) जैसे गंभीर मामलों में जो दवा से ना ठीक हो पाए जैसे रेटिनोब्लास्टोमा जैसे कैंसर में लेज़र, केमोथेरेपी या सर्जरी का उपयोग किया जाता है उसके लिए आपका डॉक्टर आपके बच्चे के लिए सर्जरी का सुझाव दे सकता है।
माता-पिता के लिए प्रैक्टिकल टिप्स
- रोज़ाना ऑब्ज़र्व करें अपने बच्चे के व्यवहार में अगर बदलाव दीखता है जैसे टीवी के बहुत पास बैठना, आँखें मलना, या सिर तिरछा करके देखना इन सब बातों को नज़रअंदाज़ न करें।
- अच्छी आदतें सिखाएँ बच्चों के पढ़ते समय पर्याप्त रोशनी का ध्यान रखें मोबाइल,टीवी का स्क्रीन टाइम कम करें (WHO के अनुसार 2 साल से कम उम्र के बच्चों के लिए स्क्रीन टाइम नहीं, और बड़े बच्चों के लिए 1 घंटा प्रतिदिन) और बाहर खेलने को प्रोत्साहित करें क्यों की प्राकृतिक रोशनी आँखों के लिए फायदेमंद है।
- सामुदायिक जागरूकता अपने आसपास के लोगों को भी बच्चों की आँखों की जाँच के महत्व के बारे में बताएँ, और सरकारी स्वास्थ्य केंद्रों या नेत्र शिविरों का लाभ उठाएँ जैसे कही निशुल्क जाँच हो रही हो स्कूल में गाँव में तो जाँच जरूर करवाएं।
अंतिम संदेश
आँखें हमें दुनिया से जोड़ती हैं और बच्चों की यह दुनिया स्पष्ट, रंगीन और खूबसूरत बनी रहे, इसके लिए रोकथाम, जागरूकता और नियमित जाँच यही मंत्र अपनाएँ क्यों की एक छोटी सी जाँच आपके बच्चे के जीवन में बड़ा बदलाव ला सकती है।
निष्कर्ष
बच्चों की आँखों की जाँच केवल एक मेडिकल प्रक्रिया नहीं, बल्कि उनके समग्र विकास, शिक्षा और भविष्य की नींव है, और शुरुआती वर्षों में आँखों की समस्याएँ अक्सर स्पष्ट लक्षण नहीं दिखातीं, जिससे स्थायी दृष्टि हानि का जोखिम बढ़ जाता है और नियमित जाँच से एम्ब्लायोपिया,स्ट्रैबिस्मस निकट दृष्टि और अन्य गंभीर रोगों का समय पर पता चल जाता है जिस्से सफल इलाज संभव हो जाता है।
आँखों की नियमित जाँच को अपने बच्चे की सेहत का अनिवार्य हिस्सा बनाएँ, क्योंकि सही दृष्टि ही सफल भविष्य की पहली सीढ़ी है।
बच्चों की आँखों की जाँच से जुड़े अक्सर पूछे जाने वाले सामान्य सवाल?
सवाल 1.बच्चों की आँखों की पहली जाँच कब करवानी चाहिए?
जवाब: बच्चों की पहली आँखों की जाँच 3 से 6 महीने की उम्र में करवा लेना चाहिए। हालाँकि, जन्म के तुरंत बाद बाल रोग विशेषज्ञ एक बुनियादी जाँच करते हैं।
सवाल 2.क्या स्कूल जाने से पहले बच्चों की आँखों की जाँच जरूरी है?
जवाब: स्कूल जाने वाले बच्चों की आँखों की जाँच जरूर करवाएँ, इससे यह सुनिश्चित होगा कि उसे ब्लैकबोर्ड देखने, पढ़ने और लिखने में कोई दिक्कत नहीं है।
सवाल 3.बच्चों की आँखों की जाँच कहाँ और किस्से करवाएँ?
जवाब: ऑप्टोमेट्रिस्ट (Optometrist) चश्मे का नंबर और बेसिक आई केयर के लिए, और नेत्र रोग विशेषज्ञ (Ophthalmologist) गंभीर समस्याओं या सर्जरी के लिए।
सवाल 4.अगर बच्चे को चश्मा लगे, तो कितने समय बाद दोबारा जाँच करवाएँ?
जवाब: अगर बच्चे को चश्मा लगा है, तो हर 6 से 12 महीने में आँखों की जाँच जरूर करवाएँ क्यों की नज़र का नंबर बदल सकता है, बढ़ती उम्र के साथ।
सवाल 5.क्या मोबाइल कम्प्यूटर टीवी लैपटॉप देखने से बच्चों की आँखों को नोकसान करता है?
जवाब: अत्यधिक स्क्रीन टाइम से बच्चों की आँखों को नोकसान पहुँचता है जिस्सेआँखों में खुजली, सूखापन या थकान हो सकती है और निकट दृष्टि का खतरा बढ़ सकता है।
सवाल 6.आँखों की अच्छी सेहत के लिए बच्चों को क्या खिलाएँ?
जवाब: अपने बच्चों की आँखों के सवस्थ के लिए विटामिन ए, सी, ई और ओमेगा-3 फैटी एसिड युक्त आहार दें जैसे हरी पत्तेदार सब्ज़ियाँ (पालक, केल गाजर, शकरकंद संतरे, आम, बेरीज़ अंडे, मछली, बादाम दूध और डेयरी उत्पाद।