ग्लूकोमा काला मोतियाबिंद क्या होता है, इसका कारण, लक्षण, प्रकार, उपचार और रोकथाम। दृष्टि के शांत चोर के बारे में जाने

​क्या आपको कभी आंखों में अचानक भारीपन या धुंधलापन जैसा महसूस होता है, अगर हाँ तो इसे सामान्य थकान समझकर नजर अंदाज न करें, क्योंकि यह ग्लूकोमा का शुरुआती संकेत हो सकता है। दरअसल ग्लूकोमा एक गंभीर नेत्र रोग है और इसे मेडिकल भाषा में ग्लूकोमा कहा जाता है।

हालांकि यह बीमारी बिना किसी दर्द और बिना किसी शुरुआती लक्षणों के धीरे-धीरे आंखों की रोशनी को स्थायी रूप से छीन सकती है। अगर इसका समय पर पहचान और इलाज न किया जाए तो यह ब्लाइंडनेस का कारण भी बन सकती है। जबकि यह बीमारी पूरे विश्व में दृष्टिहीनता का दूसरा सबसे प्रमुख कारण है।

क्योंकि आंखों के आंतरिक दबाव (Intraocular Pressure – IOP) के बढ़ने से ऑप्टिक नर्व (Optic Nerve) पर दबाव पड़ने लगता है।

Table Of Contents
  1. ग्लूकोमा क्या होता है?
  2. ग्लूकोमा का प्रमुख कारण
  3. ​ग्लूकोमा के विभिन्न प्रकार
  4. ​ग्लूकोमा के लक्षण और पहचान
  5. ग्लूकोमा के जोखिम कारक
  6. ग्लूकोमा का निदान कैसे किया जाता है?
  7. ग्लूकोमा स्थायी उपचार
  8. ग्लूकोमा से बचाव के उपाय
  9. क्या ग्लूकोमा पूरी तरह ठीक हो सकता है?
  10. किन लक्षणों में तुरंत डॉक्टर से संपर्क करें?
  11. अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)
  12. सम्बंधित लेख
  13. सफ़ेद मोतियाबिंद क्या होता है इसके प्रमुख कारण, लक्षण, रोकथाम और उपचार के बारे मे जाने

ग्लूकोमा क्या होता है?

ग्लूकोमा एक ऐसी आंखों की बीमारी है, जिसके अधिकतर व शुरुआती मामलों में कोई लक्षण दिखाई नहीं देते है। जबकि इसको बहुत से लोग दृष्टि का शांत चोर (Silent Thief of Sight) काला मोतिया और सम्बलबाई के नाम से जानते हैं। लेकिन इसको चिकित्सीय भाषा में (Glaucoma) कहा जाता है। इस बीमारी की सबसे प्रमुख बात यह है की शुरुआती दिनों में इसके कोई लक्षण दिखाई नहीं देते है। इसलिए यह दुनिया भर में दृष्टिहीनता के प्रमुख कारणों में से एक है और पूरे विश्व में दृष्टिहीनता का दूसरा सबसे प्रमुख कारण है।

दरअसल ग्लूकोमा वाले मरीजों का आंख के अंदर का दबाव, जिसे इंट्राओकुलर प्रेशर (Intraocular Pressure – IOP) कहा जाता है, सामान्य से अधिक बढ़ जाता है और यह बढ़ा हुआ दबाव धीरे-धीरे ऑप्टिक नर्व (Optic Nerve) को नुकसान पहुँचाता रहता है। ऑप्टिक नर्व वह मुख्य नस होती है जो आंखों से दृश्य संदेशों (Visual Signals) को मस्तिष्क तक भेजती है।

सबसे ​महत्वपूर्ण बात यह है की ऑप्टिक नर्व को होने वाला यह नुकसान अपरिवर्तनीय (Irreversible) होता है, मतलब इसे वापस ठीक नहीं किया जा सकता है। लेकिन मेडिकल, लेजर और सर्जिकल उपचार से इसे आगे बढ़ने से रोका जा सकता है। यही कारण है कि यह दुनिया भर में स्थायी अंधेपन का दूसरा सबसे बड़ा कारण है, क्योंकि जो नोकसान हो जाता है उसकी भरपाई फिर नही हो पाती है।

ग्लूकोमा का प्रमुख कारण

ग्लूकोमा का मुख्य कारण क्या है इसका कोई एक निश्चित जवाब नही है क्योंकि यह एक बीमारी है जो एक जन्मजात बच्चे को भी हो सकती है और किसी भी उम्र मे किसी को भी हो सकती है। लेकिन बढ़ती उम्र के साथ मिडिल आयु के और बुजुर्ग लोग इससे ज्यादा प्रभावित होते है।

दरअसल हम सब लोगों की आंख के अंदर लगातार एक तरल पदार्थ बनता और बहता रहता है, जेली जैसा जिसे एक्वस ह्यूमर (Aqueous Humor) कहते हैं। जब इस तरल पदार्थ की निकासी (Drainage System) में कोई रुकावट आती है तो यह आंख के अंदर जमा होने लगता है जिसके कारण आंख के अंदर का दबाव (IOP) बढ़ जाता है। लेकिन आप इसके प्रमुख और निम्नलिखित कारण देख सकते हैं:

  • अनुवांशिकी या वंशानुगत (Genetic Factors): यदि आपके परिवार मे आपके माता-पिता या भाई-बहन में किसी सदस्य को काला मोतियाबिंद जैसी बीमारी थी, तो आपकी आंखों मे इस बीमारी के होने का खतरा काफी बढ़ जाता है, क्योंकि वंशानुगत कारण की वजह से ऐसा हो सकता है।
  • बढ़ती उम्र (Age Factor): इस बीमारी से ज्यादा तर बढ़ती उम्र के लोग प्रभावित होते हैं। खासकर 40 वर्ष की आयु पार करने के बाद क्योंकि इस उम्र में काला मोतियाबिंद होने का खतरा काफी ज्यादा बढ़ जाता है।
  • डायबिटीज और हाई ब्लड प्रेशर: यदि आपको या आपके परिवार के किसी सदस्य को लंबे समय से शुगर या ब्लड प्रेशर के असंतुलन की समस्या है, तो याद रखें इससे आंखों की नर्व्स को नुकसान पहुँचता है और इस समस्या से होने वाले ग्लूकोमा को नियोवैस्कुलर ग्लूकोमा कहा जाता है।
  • आंखों में उच्च दबाव (High IOP): जिस तरह ब्लड प्रेशर होता है उसी तरीके का आंखों मे भी प्रेशर होता है जिसे (IOP) कहा जाता है। इसलिए इस उच्च दबाव के बढ़ने की वजह को ग्लूकोमा का प्राथमिक कारण माना जाता है। जिससे ऑप्टिक नर्व डैमेज होना शुरू हो जाती है।
  • स्टेरॉयड दवाओं का अधिक उपयोग: बिना डॉक्टर की सलाह के लंबे समय तक स्टेरॉयड युक्त आई ड्रॉप्स या टैबलेट्स का इस्तेमाल करने से भी आंखों का दबाव बढ़ जाता है और ये सेकेंडरी ग्लूकोमा नामक स्थिति उत्पन्न कर जाता है।
  • आंखों की चोट या पुरानी सर्जरी: आंखों में लगी कोई पुरानी चोट या जटिल सर्जरी भी भविष्य में ऑप्टिक नर्व को प्रभावित कर सकती है। क्योंकि इन दोनों ही स्थिति में ऑप्टिक नर्व पर अतिरिक्त दबाव पड़ने का खतरा बना रहता है और ग्लूकोमा होने का जोखिम बढ़ जाता है।

​ग्लूकोमा के विभिन्न प्रकार

ग्लूकोमा कई प्रकार के होते हैं जिनकी अपनी विषेसता होती है। आप ग्लूकोमा के निम्नलिखित प्रकार नीचे देख सकते है:

ओपन-एंगल ग्लूकोमा (Open-Angle Glaucoma)

यह ग्लूकोमा का सबसे आम और ज्यादा तर मरीजों में मतलब लगभग 90% मामलों में देखा जाता है। जिसे ओपन-एंगल ग्लूकोमा के नाम से जाना जाता है। इसमें आंख का ड्रेनेज एंगल (Trabecular meshwork) देखने में खुला लगता है, लेकिन अंदरूनी तौर पर धीरे-धीरे ब्लॉक होता है। हालांकि इसमें कोई दर्द नहीं होता और मरीज को तब तक पता नहीं चलता जब तक की उनकी नजर कम न हो हो जाए।

एंगल-क्लोजर ग्लूकोमा (Angle-Closure Glaucoma)

एंगल-क्लोजर ग्लूकोमा की स्थिति तब उत्पन्न होती है जब आंख की परितारिका (Iris) आगे बढ़कर एक्वस ह्यूमर की निकासी प्रणाली को अचानक पूरी तरह बंद कर देती है, जिससे आंख का दबाव तेजी से और अचानक बहुत अधिक बढ़ जाती है। इसलिए यह ओपन-एंगल ग्लूकोमासे अलग माना जाता है, क्योंकि यह एक गंभीर चिकित्सीय आपात स्थिति होती है।

जन्मजात ग्लूकोमा (Congenital Glaucoma)

यह जन्मजात शिशुओं और बच्चों में अधिक देखा जाता है हालांकि बच्चे इस स्थिति के साथ पैदा भी हो सकते है, हालांकि आमतौर पर इसका कारण आंख की तरल निकासी प्रणाली का सही से विकसित न होना होता है, लेकिन यह तरल निकासी बाधा या अंतर्निहित चिकित्सा स्थिति के कारण ऑप्टिक तंत्रिका को नुकसान के कारण कुछ वर्षों के भीतर विकसित हो सकती है।

पिगमेंटरी ग्लूकोमा (Pigmentary Glaucoma)

यह ओपन-एंगल ग्लूकोमा का ही एक दुर्लभ उप-प्रकार है। दरअसल पिगमेंटरी ग्लूकोमा में आईरिस के पिछले हिस्से से रंगद्रव्य (Pigment) के छोटे-छोटे कण टूटकर आंख मे तैरने लगते हैं और ये कण तरल निकासी प्रणाली मे जमा होकर उसे ब्लॉक कर देते हैं। परन्तु ज्यादा तर यह समस्या युवा और निकट-दृष्टि (मायोपिया) से पीड़ित लोगों मे ज्यादा देखी जाती है।

नार्मल-टेंशन ग्लूकोमा (Normal-Tension Glaucoma)

यह एक पेचीदा स्थिति है। मतलब नार्मल-टेंशन ग्लूकोमा मे आंख का दबाव सामान्य सीमा के भीतर होता है, लेकिन फिर भी ऑप्टिक तंत्रिका क्षतिग्रस्त होने लगती है और इसका संभावित कारण ऑप्टिक नर्व में रक्त की आपूर्ति कम होने की वजह से होता है। दरअसल ऑप्टिक नर्व का अत्यधिक संवेदनशील होना, या शरीर में रक्तचाप का बहुत कम होना इस स्थिति को बढ़ा देती है।

​ग्लूकोमा के लक्षण और पहचान

ग्लूकोमा के शुरुआती चरण मे और खासकर ओपन-एंगल ग्लूकोमा का कोई लक्षण नहीं होता है। इसलिए ग्लूकोमा वाले मरीजों को इसके होने का पता नही चल पाता है। लेकिन जैसे-जैसे बीमारी बढ़ती है या एंगल-क्लोजर ग्लूकोमा जैसी स्थिति उत्पन्न होती है, तो ऐसे मे निम्नलिखित लक्षण दिखाई दे सकते हैं:

  • दृष्टि का अचानक धुंधला हो जाना।
  • आंखों में और सिर में अचानक बहुत तेज़ दर्द होना।
  • रोशनी या बल्ब के चारों ओर रंगीन घेरे दिखाई देना।
  • उजाले या तेज प्रकाश के प्रति संवेदनशीलता होना।
  • आंखों से पानी आना और लाल होना।
  • जन्मजात शिशुओं में आंख का आकार सामान्य से बड़ा दिखाई देना या कॉर्निया का धुंधला होना।

ग्लूकोमा के जोखिम कारक

कुछ लोगों मे काला मोतियाबिंद होने की संभावना दूसरे लोगों के मुकाबले अधिक होती है। यदि आप इनमें से किसी भी श्रेणी मे आते हैं, तो ऐसे मे अपने नजदीकी डॉक्टर से परामर्श लेना और नियमित नेत्र परीक्षण कराना आपके लिए,बहुत आवश्यक है।

  • अगर आपके परिवार में किसी सदस्य को ग्लूकोमा था।
  • 40 वर्ष या उससे अधिक आयु होने पर खतरा बढ़ जाता है।
  • लंबे समय तक स्टेरॉयड दवाओं या आई ड्रॉप्स का उपयोग करने पर।
  • उच्च रक्तचाप (High Blood Pressure) मरीजों को।
  • अधिक नंबर का चश्मा लगता हो (High Myopia)।
  • मधुमेह (Diabetes) शुगर वाले मरीजों को।
  • आंखों में चोट या सर्जरी का इतिहास।

ग्लूकोमा का निदान कैसे किया जाता है?

ग्लूकोमा का समय पर पता लगाने के लिए सिर्फ एक टेस्ट से पता नहीं चलता है। ऐसी स्थिति मे आपका नेत्र रोग विशेषज्ञ तीन मुख्य पहलुओं दबाव (IOP), नस (Optic Nerve), और दृष्टि क्षेत्र (Visual Field) को देखते हुए कई परीक्षणों के संयोजन से सटीक निदान करते हैं। आप निम्नलिखित तरीके और कौन-कौन से टेस्ट किये जाते हैं देख सकते है।

  • ​विजुअल एक्यूटी टेस्ट (Visual Acuity Test): यह सबसे सामान्य दृष्टि परीक्षण है जिसमें यह देखा जाता है कि मरीज कितनी स्पष्टता से देख पा रहा है और कितना देख पा रहा है। दरअसल यह प्रारंभिक नेत्र परीक्षण का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा होता है।
  • ​स्लिट लैंप परीक्षा (Slit-Lamp Examination): इस माइक्रोस्कोप के ज़रिए डॉक्टर आपके कॉर्निया, आइरिस, लेंस और आंख के सामने के हिस्से की बारीकी से जांच करते हैं और यह देखा जाता है कि कहीं कोई सूजन, मोतियाबिंद या असामान्यता तो नहीं है।
  • टोनोमेट्री से आंख का दबाव (IOP) मापना (Tonometry): इसके जरिये आंख के अंदर के दबाव को मापा जाता है और सामान्य दबाव 10-21 mmHg के बीच होता है, लेकिन याद रखें कई बार सामान्य दबाव में भी ग्लूकोमा हो सकता है, इसलिए यह अकेला टेस्ट पर्याप्त नहीं है।
  • पैकीमेट्री (Pachymetry): इस जाँच में अगर आपका कॉर्निया मोटा है, तो दबाव सामान्य से ज़्यादा दिख सकता है भले ही वास्तविक दबाव कम हो परन्तु पतला कॉर्निया दबाव को कम दिखा सकता है। इस माप से डॉक्टर आपका सही और वास्तविक इंट्राओक्युलर दबाव निकालते हैं।
  • ऑफ्थाल्मोस्कोपी (Ophthalmoscopy): आपका डॉक्टर आंख मे पुतली फैलाने वाली आई ड्राप डालकर पुतली फैलाकर ऑप्टिक नर्व और रेटिना को बारीकी से जांच करेंगे। वे जाँचते हैं कि नस का रंग कैसा है, उसका कप (Cupping) कितना बड़ा है, क्योंकि ग्लूकोमा में यह कप धीरे-धीरे बड़ा होता जाता है।
  • ऑप्टिकल कोहेरेंस टोमोग्राफी (OCT): यह एक कंप्यूटराइज्ड 3D स्कैन जैसा होता है, मतलब एक आधुनिक स्कैन है जो ऑप्टिक नर्व और रेटिना की परतों का विस्तृत मूल्यांकन करता है। इसकी खासियत यह है कि यह बीमारी के शुरूआती चरण में भी सूक्ष्म क्षति का पता लगा लेता है, जब मरीज को कोई लक्षण नहीं दिखता। मतलब ग्लूकोमा का शुरुआती नुकसान का भी पता लग जाता है।
  • ​गोनियोस्कोपी (Gonioscopy): यह ग्लूकोमा के प्रकार को निर्धारित करने के लिए आपका डॉक्टर आंख पर एक विशेष कॉन्टैक्ट लेंस रख कर देखते हैं, कि आंख का जल-निकासी कोण खुला है या बंद है। इदरअसल इस पर इलाज की रणनीति निर्भर करती है और सबसे ज़रूरी टेस्ट है।
  • विजुअल फील्ड टेस्ट / पेरीमेट्री (Perimetry): इस जाँच के जरिये काला मोतियाबिंद की वजह से आपकी साइड की विजन (Peripheral Vision) कितनी प्रभावित हुई है ये देखा जाता हैं। दरअसल इसमें एक घुमावदार मशीन के अंदर आपको बीच में एक बिंदु पर फोकस कर के देखना होता है और जब भी किनारे पर कोई रोशनी चमके, तो बटन दबाना होता है।

ग्लूकोमा स्थायी उपचार

याद रखें ग्लूकोमा से खोई हुई रोशनी को वापस नहीं लाया जा सकता है। हालांकि इसका कोई अस्थाई इलाज नहीं होता है लेकिन उपलब्ध उपचारों की मदद से आंखों के दबाव को नियंत्रित किया जा सकता है। मतलब समय पर उपचार और नियमित फॉलो-अप से आगे होने वाली दृष्टि हानि के जोखिम को काफी हद तक कम किया जा सकता है।

A. मेडिकल ट्रीटमेंट (दवाइयाँ और आई ड्रॉप्स)

सम्बलबाई के इलाज का सबसे पहला चरण है, दवाइयाँ और आई ड्रॉप्स। इस स्थिति में आपका डॉक्टर एग्जामिनेशन करने के बाद आंखों का दबाव कम करने के लिए कुछ विशेष आई ड्रॉप्स (जैसे Latanoprost, Timolol, Brimonidine) या ओरल टैबलेट्स (जैसे Acetazolamide) स्थिति के अनुसार प्रिस्क्राइब कर सकते हैं।

लेकिन याद रखें ये सब बिना डॉक्टर की निगरानी में आंखों में डालना और खाना स्थिति को और ख़राब कर सकती है, इसलिए डॉक्टर के प्रिस्क्राइब करने के बाद ही इन सबका सेवन करना चाहिए।

B. लेज़र ट्रीटमेंट (लेज़र थेरेपी )

लेजर ट्रीटमेंट का सुझाव आपका डॉक्टर उस स्थिति में देते हैं, जब दवाइयाँ असरदार साबित नहीं होतीं हैं। मतलब दवाइयाँ और आई ड्रॉप्स से आंखों का दबाव कम तो होता है लेकिन जो रिजल्ट मिलना चाहिए ओ नही मिलता इसलिए आंखों के दबाव और स्थिति के अनुसार लेज़र का सहारा लिया जाता है। इसमें शामिल हैं लेज़र ट्रैबेकुलोप्लास्टी तकनीक और लेज़र इरिडोटोमी तकनीक जिनकी अपनी विषेसता हैं।

  • लेज़र ट्रैबेकुलोप्लास्टी: इस तकनीक का उपयोग ओपन-एंगल ग्लूकोमा के लिए की जाती है ताकि तरल का बहाव बेहतर हो सके।
  • लेज़र इरिडोटोमी: इस तकनीक का उपयोग एंगल-क्लोजर ग्लूकोमा के मरीजों में ड्रेनेज का नया रास्ता बनाने के लिए की जाती है।

​C. सर्जिकल ट्रीटमेंट (सर्जरी)

काला मोतियाबिंद का दवा और लेज़र दोनों से दबाव नियंत्रित न हो, तो अंतिम विकल्प के रूप में सर्जरी की जाती है। लेकिन सर्जरी स्थिति के ऊपर निर्भर करती है और आपके डॉक्टर द्वारा लिए गए फैसले पर, क्योंकि सर्जरी अलग अलग तकनीक से की जाती है और इनकी अपनी विषेसता होती हैं।

  • ​ट्रैबेक्युलेक्टॉमी (Trabeculectomy): यह सबसे पारंपरिक सर्जरी है और ग्लूकोमा के लिए सबसे प्रचलित हैं जिसमें आंख में तरल निकासी के लिए एक नया छोटा रास्ता बनाया जाता है।
  • ड्रेन इम्प्लांट सर्जरी (Drain Implant Surgery): यह ऑपरेशन उन मरीजों के लिए होता है जिन मरीजों में पारंपरिक सर्जरी सफल नहीं होती या छोटे बच्चों में। दरअसल इसके जरिये एक सूक्ष्म वाल्व या ट्यूब इम्प्लांट की जाती है।

ग्लूकोमा से बचाव के उपाय

  • नियमित जाँच: 40 वर्ष की उम्र के बाद साल में कम से कम एक बार आंखों की जाँच जरूर करवाना चाहिए ।
  • पारिवारिक इतिहास पर ध्यान दें: यदि परिवार में किसी को ग्लूकोमा है, तो 35-40 की उम्र के बाद हर 1-2 साल में स्क्रीनिंग कराएं।
  • ​बीमारियों को रखें कंट्रोल: यदि आपको डायबिटीज और ब्लड प्रेशर जैसी बीमारी है तो इसके स्तर को हमेशा सामान्य बनाए रखें मतलब इसका परहेज और उपचार अवश्य करवाएं।
  • स्क्रीन टाइम सीमित करें: मोबाइल और कंप्यूटर का इस्तेमाल करते समय उचित दूरी रखें और बीच-बीच में आंखों को आराम दें। मतलब 20-20-20 नियम का हो सके तो पालन अवश्य करें।
  • स्वस्थ आहार लें: हरी पत्तेदार सब्जियां, गाजर, खट्टे फल और विटामिन-A तथा एंटीऑक्सीडेंट से भरपूर डाइट लें।
  • सेल्फ-मेडिकेशन से बचें: बिना डॉक्टर की सलाह के मेडिकल स्टोर से लाकर कोई भी स्टेरॉयड आई ड्रॉप कभी न डालें और न ही कोई बिना डॉक्टर प्रिस्क्राइब के दवा का सेवन करें।

क्या ग्लूकोमा पूरी तरह ठीक हो सकता है?

नहीं ऐसा बिलकुल भी नही है। दरअसल ग्लूकोमा से ऑप्टिक नर्व को जो नुकसान हो चुका होता है, उसे वर्तमान चिकित्सा उपचार से वापस नहीं लाया जा सकता। लेकिन यदि बीमारी का समय पर पता चल जाए और नियमित उपचार शुरू किया जाए, तो आंखों के दबाव को नियंत्रित करके आगे होने वाली दृष्टि हानि को काफी हद तक रोका जा सकता है।

यदि आपको या आपके परिवार मे किसी सदस्य को या आपके जानने वाले को काला मोतियाबिंद है, तो याद रखें इसका नियमित जाँच और डॉक्टर द्वारा बताई गई दवाओं का सही समय पर उपयोग करना बेहद जरूरी है।

किन लक्षणों में तुरंत डॉक्टर से संपर्क करें?

ग्लूकोमा होने पर और शुरुआती दौर मे इसके लक्षणों को बहुत से समझ और पहचान नही पाते हैं। जिसके कारण ये धीरे-धीरे दृष्टि को चुरा लेते हैं इसलिए इसको दृष्टि का शांत चोर कहा जाता है। यदि आपको नीचे दिये गए कोई भी लक्षण दिखाई दें तो ऐसे मे तुरंत अपने नजदीकी नेत्र विशेषज्ञ से संपर्क करें।

  • अचानक आंख में तेज दर्द होने लगे।
  • अचानक धुंधला दिखाई देने लगे।
  • रोशनी के चारों ओर इंद्रधनुष जैसे रंगीन घेरे दिखाई दे।
  • आंखों का लाल हो जाना।
  • सिरदर्द के साथ उल्टी या मितली हो।
  • अचानक दृष्टि कम हो जाए।
संदर्भ (References)

1. American Academy of Ophthalmology (AAO) – Understanding Glaucoma

2. National Eye Institute (NEI) – Glaucoma

3. World Glaucoma Association (WGA)

4. World Health Organization (WHO) – Blindness and Vision Impairment

5. American Glaucoma Society (AGS)

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

क्या ग्लूकोमा पूरी तरह से ठीक हो सकता है?

नहीं, दरअसल ग्लूकोमा के कारण आंखों की नस (ऑप्टिक नर्व) को जो क्षति पहुँच चुकी होती है, वह स्थायी होती है और इसे ठीक नही किया जा सकता है। लेकिन समय पर पहचान और इलाज से आगे होने वाली दृष्टि हानि को रोका जा सकता है।

क्या ग्लूकोमा बिना दर्द के भी हो सकता है?

हाँ बिल्कुल ऐसा हो सकता है और खासकर ओपन-एंगल ग्लूकोमा वाले मरीजों को क्योंकि इसके शुरुआती अवस्था में रोगी को कोई दर्द, जलन या धुंधलापन महसूस नहीं होता। इसी कारण इसे ‘दृष्टि का चोर’ (Silent Thief of Sight) भी कहा जाता है। जबकि इसका पता अक्सर नियमित जांच के दौरान ही चलता है।

क्या ग्लूकोमा के लिए ऑपरेशन करवाना ही एकमात्र विकल्प है?

नहीं, ऐसा बिल्कुल भी नहीं है। दरअसल अधिकांश रोगियों में केवल नियमित आई ड्रॉप्स या लेज़र उपचार के माध्यम से ही आंखों का दबाव सफलतापूर्वक नियंत्रित किया जा सकता है। सर्जरी का सहारा आमतौर पर तब लिया जाता है, जब दवाएं या लेज़र पर्याप्त प्रभावी न हों।

क्या दोनों आंखों में ग्लूकोमा हो सकता है?

हाँ, यह रोग आमतौर पर दोनों आंखों को भी प्रभावित कर सकता है। मतलब (द्विपक्षीय रोग) हो सकता है। हालांकि, शुरुआत में एक आंख में दूसरे की तुलना में अधिक लक्षण दिख सकते हैं।

क्या ग्लूकोमा वंशानुगत बीमारी है?

हाँ, ग्लूकोमा में पारिवारिक इतिहास एक महत्वपूर्ण जोखिम कारक माना जाता है। यदि आपके माता-पिता, भाई-बहन या बच्चों में से किसी को ग्लूकोमा है, तो आपको इस बीमारी का जोखिम सामान्य लोगों की तुलना में काफी अधिक (4-9 गुना तक) हो जाता है।